“भावनात्मक दिल को बचाने की पहली मदद” सुनील वात्स्यायन इमोशनल CPR प्रशिक्षक | राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, NAPSWI Source: https://www.jagran.com/
बच्चे और किशोर अक्सर मदद माँग नहीं पाते—इसलिए इंतज़ार करना खतरनाक हो सकता है।
जैसे CPR तब दिया जाता है जब व्यक्ति खुद कुछ कहने की स्थिति में नहीं होता, वैसे ही eCPR तब ज़रूरी है जब भावनात्मक हृदय चुपचाप टूट रहा हो।
इमोशनल CPR कोई एक दिन का अभ्यास नहीं है—यह हर दिन, हर बार अपनाया जाने वाला मानवीय दायित्व है। अगर हम समय रहते जुड़ना सीख लें, तो शायद बहुत पहले ही ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
बच्चे और किशोर अक्सर मदद माँग नहीं पाते—इसलिए इंतज़ार करना खतरनाक हो सकता है।
जैसे CPR तब दिया जाता है जब व्यक्ति खुद कुछ कहने की स्थिति में नहीं होता, वैसे ही eCPR तब ज़रूरी है जब भावनात्मक हृदय चुपचाप टूट रहा हो।
इमोशनल CPR कोई एक दिन का अभ्यास नहीं है—यह हर दिन, हर बार अपनाया जाने वाला मानवीय दायित्व है। अगर हम समय रहते जुड़ना सीख लें, तो शायद बहुत पहले ही ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों द्वारा आत्महत्या की घटना केवल एक हृदयविदारक समाचार नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि बच्चों और किशोरों की भावनात्मक पीड़ा को हम कब तक अनदेखा करते रहेंगे।
प्रारंभिक जानकारियों में अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग, सामाजिक अलगाव और पारिवारिक संवाद की कमी जैसे कारण सामने आए हैं। लेकिन केवल कारण गिनाना पर्याप्त नहीं है। असली प्रश्न यह है—क्या इस भावनात्मक संकट को समय रहते पहचाना और संभाला जा सकता था?
यह मामला “कमज़ोरी” का नहीं, बल्कि समय पर मानवीय प्रतिक्रिया के अभाव का है।
मदद माँगना बच्चों में लगभग नहीं के बराबर होता है
विशेष रूप से बच्चों और किशोरों में मदद माँगने का व्यवहार बहुत कमज़ोर या लगभग न के बराबर होता है। वे अक्सर अपनी पीड़ा को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते।
उनकी भावनात्मक तकलीफ कई बार इस रूप में सामने आती है—
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चिड़चिड़ापन या आक्रामक व्यवहार
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आत्म-हानि की प्रवृत्ति
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नशे या अत्यधिक भोजन की ओर झुकाव
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अत्यधिक अकेलापन और स्वयं को अलग कर लेना
कई बच्चे और किशोर “निजता” या “अकेले रहने” के नाम पर खुद को अलग कर लेते हैं और ऐसे व्यवहार अपनाते हैं, जो उन्हें दूसरों के सवालों, हस्तक्षेप या संवाद से बचाए रखते हैं—क्योंकि उन्हें वह संवाद आक्रामक या असहज लगता है।
परिवार, पड़ोस और स्कूल की भूमिका
बच्चों के जीवन में माता-पिता, शिक्षक, पड़ोसी और स्कूल पहला सुरक्षा घेरा होते हैं। व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक मोबाइल या गेमिंग, चुप्पी, अकेलापन—ये अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि मदद की खामोश पुकार हो सकते हैं।
यदि स्कूलों में प्रशिक्षित सोशल वर्कर उपलब्ध होते, या समुदाय में भावनात्मक संकट को पहचानने और संभालने की समझ होती, तो समय रहते परिवार तक पहुँचा जा सकता था। दुर्भाग्यवश, आज भी अधिकांश स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक कार्य को प्राथमिकता नहीं दी जाती।
इमोशनल सीपीआर (eCPR) क्यों ज़रूरी है?
जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से गिर पड़ता है और मदद माँगने की स्थिति में नहीं होता, तब आसपास मौजूद लोग निर्णय लेते हैं और CPR देकर उसकी जान बचाने का प्रयास करते हैं।
ठीक उसी तरह, जब कोई व्यक्ति—खासकर बच्चा या किशोर—भावनात्मक रूप से टूट रहा होता है, तब वह अक्सर मदद माँगने की स्थिति में नहीं होता।
इमोशनल CPR (eCPR) हमें यह सिखाता है कि ऐसे समय में कैसे आगे बढ़कर उस व्यक्ति के “भावनात्मक हृदय” को सहारा दिया जाए।
eCPR का उद्देश्य यह है कि हम स्वयं सहायता दें या किसी अन्य सक्षम व्यक्ति को ज़िम्मेदारी सौंपें—जब तक उस व्यक्ति को प्रशिक्षित मनोचिकित्सक, स्कूल सोशल वर्कर या मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर तक सुरक्षित रूप से नहीं पहुँचाया जाता।
eCPR केवल संकट का उपाय नहीं, रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारी है
इमोशनल CPR केवल किसी एक दिन या संकट की घड़ी तक सीमित नहीं है।
यह हर दिन, हर समय, बार-बार (हर बार) अपनाया जाने वाला मानवीय व्यवहार है।
क्योंकि जब तक हम इंतज़ार करेंगे कि कोई खुद मदद माँगे—
तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।
मदद माँगने की प्रवृत्ति बेहद कम या लगभग अनुपस्थित होती है, इसलिए ज़रूरी है कि हम पहले जुड़ें, पहले समझें और पहले सहारा दें।
eCPR क्या है?
eCPR एक जन-स्वास्थ्य आधारित शैक्षणिक पहल है, जो आम लोगों—माता-पिता, शिक्षक, छात्र, पड़ोसी—को यह सिखाती है कि भावनात्मक संकट में किसी की मदद कैसे की जाए, बिना उपदेश दिए, बिना जज किए।
प्रभावित लोग अक्सर कहते हैं—
“लोग हमें समझते कम हैं, सिखाते ज़्यादा हैं।”
eCPR सिखाता है समझने की कला।
eCPR के तीन स्तंभ
C – Connect (जुड़ाव)
संवेदनशीलता और करुणा के साथ संवाद खोलना
“ऐसा क्या हुआ कि आप ऐसा महसूस कर रहे हैं?”
P – emPower (सशक्तिकरण)
व्यक्ति को अपनी शक्ति, उद्देश्य और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का एहसास कराना
“मैं इस समय आपकी कैसे मदद कर सकता/सकती हूँ?”
R – Revitalize (पुनर्स्थापन)
संबंधों, दिनचर्या और सामाजिक भूमिका से दोबारा जोड़ना
“पहले कभी किसी चीज़ या व्यक्ति ने आपको इससे उबरने में मदद की थी?”
समुदाय आधारित रोकथाम की ज़रूरत
इमोशनल CPR और नशा मुक्ति प्रशिक्षक, विद्या लीड अकादमी के CEO और National Association of Professional Social Workers in India के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य Suneel Vatsyayan मानते हैं कि आत्महत्या रोकथाम केवल मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की ज़िम्मेदारी नहीं हो सकती।
Nada India Foundation और NAPSWI के साथ मिलकर संचालित हेल्दी कैंपस अभियान के माध्यम से 20 से अधिक विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित छात्र एम्बेसडर और सोशल वर्कर भावनात्मक रूप से सुरक्षित परिसर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। यही मॉडल अब स्कूलों और समुदायों तक पहुँचना चाहिए।
जागरूकता से आगे—कार्रवाई की ओर
अब ज़रूरत है—
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माता-पिता और शिक्षकों के लिए भावनात्मक प्राथमिक सहायता प्रशिक्षण
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स्कूलों में अनिवार्य सोशल वर्कर की नियुक्ति
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बच्चों की भावनाओं पर खुली, सुरक्षित बातचीत
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शारीरिक CPR के साथ इमोशनल CPR की शिक्षा
हर आत्महत्या एक सामूहिक असफलता है—
लेकिन हर समय पर दिया गया सहारा एक साझा जीत हो सकता है।
For E-CPR trainings Vidya Lead Academy Mobile 9810594544, Landline 01204941255 write to vidyaleadacademy@gmail.com
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